कुरुक्षेत्र के भगवद्गीता सदन में 24 नवंबर, 2025 को सुबह 10:30 बजे शुरू हुआ 10वां अंतर्राष्ट्रीय गीता सम्मेलन। भारत के उपराष्ट्रपति जगदीश धनखड़ ने इस ऐतिहासिक समारोह की शुरुआत की, जो अब तक का सबसे विशाल और वैश्विक संस्करण है। यह सम्मेलन कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड की ओर से आयोजित किया जा रहा है, और इसका विषय है — ‘श्रीमद्भगवद्गीतोक्त स्वधर्म: कर्तव्यनिष्ठा, शान्ति, सद्भावना एवं स्वदेशी की प्रेरणा’। ये शब्द बस एक नारा नहीं, बल्कि आज की दुनिया के लिए एक जीवन-संकल्प हैं।
भारत के विदेश मंत्री ने वैश्विक संदेश दिया
इसी दिन, डॉ. एस. जयशंकर, भारत के विदेश मंत्री, ने ऑनलाइन संबोधन किया। उन्होंने कहा, ‘यह समारोह केवल एक सांस्कृतिक इकट्ठा नहीं, बल्कि वैश्विक साझा मूल्यों की पुनर्पुष्टि है।’ उनके शब्दों में एक गहरा संकल्प था — गीता को भारत के बाहर भी एक जीवंत आध्यात्मिक वारिस बनाना।
विदेश मंत्रालय ने दुनिया भर के 50 से अधिक भारतीय दूतावास के साथ साझेदारी की है। ये दूतावास अपने-अपने देशों में समानांतर कार्यक्रम, प्रदर्शनी और संवाद सत्र आयोजित कर रहे हैं। एक अद्भुत तथ्य? गीता के 25 से अधिक भाषाओं में अनुवाद इस सम्मेलन के लिए एकत्रित किए गए हैं — जिनमें फ्रेंच, जापानी, रूसी, स्वीडिश और स्वाहिली सहित दुनिया के विभिन्न कोनों की भाषाएँ शामिल हैं। ये किताबें सिर्फ प्रदर्शित नहीं हो रहीं, बल्कि उनके अनुवादकों के साथ विचार-विमर्श भी हो रहा है।
क्यों कुरुक्षेत्र? ऐतिहासिक जड़ें
कुरुक्षेत्र कोई साधारण शहर नहीं। यह वही जगह है जहाँ अर्जुन और कृष्ण का वह अनोखा संवाद हुआ, जिसने अंतर्जातीय युद्ध के बजाय आत्म-जागरूकता का मार्ग दिखाया। कुरुक्षेत्र ने अब तक के नौ संस्करणों में गीता के विद्वानों को अपनी धरती पर इकट्ठा किया है। यहाँ का प्रत्येक पत्थर, प्राचीन तीर्थ, और उत्खनन से मिले अवशेष गीता की गहराई को दर्शाते हैं।
1956 में स्थापित कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने इस विरासत को शिक्षा में बदल दिया है। यहाँ के प्रोफेसर अब गीता को न केवल धर्मशास्त्र के रूप में, बल्कि नेतृत्व, नैतिकता और सामाजिक स्थिरता के लिए एक वैज्ञानिक आधार के रूप में पढ़ाते हैं। यही कारण है कि आज जर्मनी के फिलॉसफी प्रोफेसर, ब्राजील के मनोवैज्ञानिक, और जापान के बिजनेस लीडर यहाँ आते हैं — न केवल भारत की आध्यात्मिकता देखने, बल्कि उसकी आज की दुनिया में अनुप्रयोग को समझने।
वैश्विक शिक्षाविदों का योगदान
इस बार विदेशी विद्वानों की संख्या पिछले संस्करणों से दोगुनी है। नेदरलैंड्स के एक अध्यापक ने गीता के ‘कर्मयोग’ को आधुनिक प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के साथ जोड़ा है। एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ने दिखाया कि गीता का ‘असक्त कर्म’ आज के तनाव और बर्नआउट के इलाज का आधार बन सकता है। ये सिर्फ विचार नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुप्रयोग हैं।
एक विशेषज्ञ ने कहा — ‘जब एक जापानी बच्चा गीता के अनुवाद को अपनी माँ के साथ पढ़ता है, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं पढ़ रहा, बल्कि एक विश्व दर्शन का सामना कर रहा है।’ यही तो है गीता की असली ताकत — वह किसी एक संस्कृति की नहीं, बल्कि मानवता की है।
क्या यह सिर्फ एक सम्मेलन है?
नहीं। यह एक आंदोलन है।
हर साल, यहाँ के विद्वान गीता के एक अध्याय को चुनते हैं और उसे आधुनिक समस्याओं से जोड़ते हैं। इस बार ‘स्वधर्म’ और ‘स्वदेशी’ को चुना गया है — दो ऐसे शब्द जिन्हें आज के वैश्वीकरण के युग में अक्सर गलत तरीके से समझा जाता है। लेकिन गीता के अनुसार, स्वधर्म वह है जो आपकी आत्मा के साथ मेल खाता है — न कि आपकी जाति या धर्म के अनुसार। और स्वदेशी वह नहीं जो बाहर से आया हो, बल्कि वह जो आपके अंदर से उगा हो।
इसी तरह, गीता का ‘शांति’ शब्द लड़ाई नहीं, बल्कि आंतरिक अर्थों का शांतिपूर्ण समायोजन है। यही वह संदेश है जो आज के युवा, व्यापारी, और नीति निर्माताओं के लिए जरूरी है।
अगले कदम: गीता का डिजिटल विरासत
इस सम्मेलन के बाद, विदेश मंत्रालय और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय एक डिजिटल गीता अर्काइव बनाने की योजना बना रहे हैं — जिसमें सभी 25 अनुवाद, विदेशी विद्वानों के संवाद, और भारतीय गुरुओं के व्याख्यान शामिल होंगे। यह एक निःशुल्क ऑनलाइन प्लेटफॉर्म होगा, जिसे विश्व के किसी भी कोने से एक्सेस किया जा सकेगा।
एक छात्र ने मुझसे कहा — ‘हम गीता को नहीं, बल्कि उसके अर्थ को दुनिया के साथ बाँटना चाहते हैं।’ यही वास्तविक विजय है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गीता सम्मेलन का उद्देश्य क्या है?
गीता सम्मेलन का उद्देश्य भगवद्गीता के आध्यात्मिक और नैतिक संदेश को आधुनिक चुनौतियों — जैसे तनाव, नैतिक अनिश्चितता, और सामाजिक विभाजन — के साथ जोड़ना है। यह केवल धार्मिक चर्चा नहीं, बल्कि नेतृत्व, शिक्षा और वैश्विक शांति के लिए एक व्यावहारिक दिशा-निर्देश बनाने का प्रयास है।
इस बार विदेशी विद्वानों की भागीदारी क्यों अधिक है?
विदेश मंत्रालय ने 50 से अधिक भारतीय दूतावासों के साथ साझेदारी करके वैश्विक विद्वानों को आमंत्रित किया है। ये विद्वान गीता के अनुवादों के आधार पर अपने देशों में उसकी व्यावहारिक अनुप्रयोग को समझाते हैं — जैसे जर्मनी में नेतृत्व शिक्षा, ब्राजील में मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग, और जापान में व्यवसायिक नैतिकता।
गीता के 25 अनुवाद कहाँ से आए हैं?
ये अनुवाद दुनिया भर के विश्वविद्यालयों, संस्थानों और व्यक्तिगत शोधकर्ताओं से एकत्रित किए गए हैं। इनमें फ्रेंच, जापानी, रूसी, स्वीडिश, स्वाहिली, अरबी और चीनी सहित भाषाएँ शामिल हैं। कुछ अनुवाद 19वीं शताब्दी के हैं, जब पश्चिमी विद्वानों ने गीता को पहली बार पढ़ा।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की भूमिका क्या है?
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने 1956 से गीता को शिक्षा का हिस्सा बनाया है। यहाँ के विद्वान गीता के अध्यायों को नैतिक निर्णय, आत्म-जागरूकता और सामाजिक समावेशन के साथ जोड़ते हैं। यह सम्मेलन उनके शोध और शिक्षा के अनुभव का वैश्विक प्रदर्शन है।
गीता का ‘स्वधर्म’ आज के युवाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
‘स्वधर्म’ का अर्थ आज के युवाओं के लिए अपनी योग्यता, रुचि और आंतरिक आवाज के अनुसार काम करना है — न कि सामाजिक दबाव या बाहरी उम्मीदों के अनुसार। गीता यही कहती है: ‘अपना कर्तव्य अपने अनुसार करो, दूसरों का नहीं।’ यही आत्म-सम्मान और स्थिरता का आधार है।
इस सम्मेलन का भविष्य क्या है?
इसका भविष्य डिजिटल गीता अर्काइव के माध्यम से है — जिसमें सभी अनुवाद, व्याख्यान और वैश्विक संवाद एकत्रित होंगे। यह प्लेटफॉर्म विश्व के छात्रों, शिक्षकों और नीति निर्माताओं के लिए एक मुफ्त संसाधन बनेगा, जो गीता को धर्म के बजाय मानवीय जीवन के लिए एक दर्शन के रूप में पढ़े।
Vikash Kumar
नवंबर 26, 2025 AT 02:15फिर से गीता का नाम लेकर राजनीति कर रहे हो! ये सब नाटक है, असली जीवन में कोई गीता नहीं पढ़ता।
Siddharth Gupta
नवंबर 26, 2025 AT 23:43भाई, ये तो बिल्कुल जबरदस्त है! जापानी बच्चे गीता पढ़ रहे हैं, जर्मन प्रोफेसर उसे प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में यूज़ कर रहे हैं... ये तो धर्म नहीं, एक वर्ल्ड ऑपरेटिंग सिस्टम है! 🌍✨
Anoop Singh
नवंबर 28, 2025 AT 00:11अरे भाई, तुम लोग गीता को इतना बड़ा बना रहे हो लेकिन तुम्हारे घर में बच्चे अंग्रेजी में बात करते हैं और हिंदी नहीं बोल पाते! अपने घर से शुरू करो फिर दुनिया की बात करो।
Omkar Salunkhe
नवंबर 28, 2025 AT 20:2325 भाषाओं में अनुवाद? हाँ हाँ... और उनमें से 20 अनुवाद अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ में बने हैं जहाँ गीता को 'हिंदू बुद्धिस्ट बुक' कहा जाता है। ये सब फेक नैशनलिस्ट ड्रामा है।
raja kumar
नवंबर 29, 2025 AT 14:35ये सम्मेलन असली शान है। जब एक जापानी महिला गीता के अनुवाद के साथ अपने बच्चे को नींद आने से पहले पढ़ती है तो ये तो वाकई एक संस्कृति का विस्तार है। इसे बस इतना ही रहने दो।